पंछी का ख़्वाब




एक कैद पंछी रोज़ ख़्वाब देखता है उड़ने का
आंख खुलते ही मातम मनाता है अपनी बेबसी का

बरसों होगए उसे उड़ान भरे हुए
आसमान को आज भी उसका इंतेज़ार है

पंछी को नफ़रत होगई है ख़्वाब से
नहीं जीना चाहता झूठी आस में

क़ुबूल कर लिया था अपनी किस्मत को
पर उड़ने के ख़्वाब ने पनाह दी थी एक उम्मीद को

यक़ीनन ये क़ैद उम्र भर नहीं रहेगी
न जाने ज़िंदगी कब तक यूं ही चलती रहेगी

अफ़सोस है पंछी को
लड़खड़ाएं न कदम उसके
जब वो आज़ाद हो उड़ने को।

                                 -आतिफ़ा ऐमन



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