ख़्वाब की हक़ीक़त

 


ख्वाब क्या है? 

जो हम सोचते हैं या जो दुनिया को दिखाने के लिए देखा जाता है या फिर वो जो हकीकत से परे होता है। ख्वाब देखना कोई मुश्किल काम नहीं, पूरा करना मुश्किल होता है लेकिन जब पूरा हो जाए फिर इंसान क्या करे? ख़्वाब जब तक दिमाग मे रहता है तब तक खूबसूरत लगता है और जैसे ही वो हकीकत बन जाता है, फिर अपने ख्वाब पर ही हैरानी होती है कि काश ये ख्वाब पूरा ना हुआ होता। तो हाँ इसलिए मुझे डर लगता है ख्वाब देखने से, देखने से ज्यादा इस बात से कि ये जिसे मैंने खूबसूरत ख्वाब समझ कर देखा कहीं वो मेरी जिंदगी की डरावनी हकीकत न बन जाए। तो बस अब कोशिश रहेगी कि अपनी हकीकत को अपनाऊँ और उसे ख्वाब कि तरह खूबसूरत बनाऊँ। अगर ख्वाब सच होना मुमकिन है तो हकीकत सवारना भी नामुमकिन नहीं। 
दरअसल हम एक बड़ा ख्वाब देख लेते हैं लेकिन उस तक पहुँचने वाले अनेक रास्तों का हमें अंदाज़ा नहीं होता। कुछ रस्ते चलने के बाद लगता है गलती कर दी ख्वाब देख कर, लेकिन ये वो वक्त है जब खुद को अपने जुनून के बारे में याद दिलाया जाए कि आखिर क्यों तुम इस ख्वाब को पूरा करने कि कोशिश मे जुटे, आखिर क्यों देखा था ये ख्वाब? 
मुझे लगता है कि हमारी मंज़िल तय है, लेकिन मंज़िल तक पहुँचने के रस्ते टेढ़े मेढ़े हैं। हर गलत या सही कदम मुझे उस मंज़िल तक ही पहुंचाएगा जो मेरी किस्मत ने तय किया है। एक तरह से कहा जा सकता है कि कुछ मेरे हाथ मे नहीं, बस एक चीज़ मेरे हाथ मे है- आगे बढते रहना, रुकना नहीं। अगर मैं रुकी तो मंज़िल तक पहुँचने मे देरी हो जाएगी, आगे बढ़ती रही तो कैसे न कैसे मंज़िल तक ज़रूर पहुंचूंगी। इंसान रुकता तब है जब वो जुड़ने लगता है, लोगों से, चीज़ों से और यादों से। ये सब हमें कमज़ोर बनाती है और साथ ही ये हमारे इंसान होने का सबूत है। 
मैं अक्सर मुश्किल रास्तों में आ जाती हूँ और वो भी इसलिए क्योंकि मैं एक ऐसा ख्वाब देखती हूँ जो मेरे लिए मामूली नहीं। आसान रास्ता ले सकती थी लेकिन किस्मत को शायद यही मंज़ूर है। मेरे जैसे कई हैं जो इन रास्तों मे भटक रहे हैं, सब एक दूसरे का ही सहारा लिए हुए हैं क्योंकि वो भी जानते हैं कि ये मुश्किल रास्ता है और एक दूसरे से खुदको हौसला मिलता है। 
रास्ता चाहे जो भी लो, इंसान हमेशा इस सोच मे पड़ जाता है कि अगर यूँ न होता तो क्या होता?  

क्या ख्वाब पूरा होने पर सुकून मिलेगा? 

बाकियों का तो पता नहीं पर मैं सुकून कि तलाश में भटक रही हूँ। एक ऐसी चीज़ जिसका तसव्वुर करना भी समझ नहीं आता, जिसकी परिभाषा देना तक मुश्किल है। आखिर क्यों? हम सुकून को अलग-अलग चीज़ों में पाते हैं लेकिन कोई एक मुकम्मल जगह नहीं इस दुनिया में जहाँ जिंदगी भर सुकून मिले। मरने के बाद तो तय है कि जन्नत में सुकून मिलेगा लेकिन इस दुनिया का क्या। दुनियावी चीजों से अगर दिल लगाओ तो वो सिर्फ कुछ पल के लिए सुकून देती हैं, लेकिन कभी भी मुकम्मल सुकून नहीं दे पातीं। उन चीजों से जिंदगी भर जुड़ कर नहीं रहा जा सकता, जो लोग आसान रास्ता इख्तियार करते हैं वो भी ज्यादा वक्त तक दुनियावी सुकून को नही जी सकते। 


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