भारत की अनेकता में एकता

 


सुना था भारत स्वतंत्र देश है। यहाँ अनेकता में एकता पाई जाती है। सभी धर्म व जाति के लोग मिल जुल कर रहते हैं। और ऐसे ही भारत में मैं पली बढ़ी। चाहे स्कूल हो या यूनिवर्सिटी जहां से भी मैंने तालीम हासिल की, इस एकता व आपसी भाईचारे को पाया। दिल तो तब टूटा जब 2019 में मेरे अपने देश ने कहा सबूत दो की तुम हिंदुस्तानी हो। नहीं है सबूत तो जाओ पाकिस्तान को। हैरत तो इस बात पर थी कि ये एकता में रहने वालों को इसमें कुछ गलत न लगा। वो बोले हां सही तो है, हिंदुओ के लिए हिंदुस्तान, मुसलमानों के लिए पाकिस्तान। ऐसे वक्त में हौसला दिलाने राहत इंदौरी साहब का शेर याद आया -

"सभी का खून है शामिल यहा की मिट्टी मे

किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है.."

उस वक़्त इतने दंगे हुए, जानें गईं। मैंने अपने दम पर आवाज उठानी शुरू की तो कुछ बोले चुप जा, मत आवाज़ उठा, ये तो सब झूठी खबरें हैं। मुझे बताओ, दंगो में जले मुसलमानों के घर झूठ? उनकी बर्बाद हुई ज़िन्दगी झूठ? उनके आंसू झूठ? कई लोगों के असली चेहरे मेरे सामने आए। पता लगा कि वो तो बस एकता का नाटक करते आ रहे थे, इतनी देर में जाना कितनी नफरत थी इनके अंदर मेरे लिए, मेरी कौम के लिएं।



दंगे फ़साद व प्रोटेस्ट चल ही रहे थे कि आ गया कोरोना। लगा मुझे की अब आएगी वापिस अनेकता में एकता, लोग एक दूसरे को समझेंगे व मदद करेंगे। याद आ जाएगा उन्हें आपसी भाई चारा। मैं गलत साबित हुई। कोरोना फैले दुनिया मे हो चुके थे तीन महीने और भारत में मात्र 2 हफ़्ते। इलज़ाम लगा मुसलमानों पर की फैलाया इन्होंने कोरोना। जाहिलों की कमी न थी। न आज है न तब थी। खुद एक पत्रकारिता की लाईन में होते हुए मैंने सोचा आखिर मीडिया तो सच दिखाएगा। लेकिन असलियत में मीडिया ने ही सबसे ज़्यादा नफ़रत फैलाया। जिनको मैं अपना दोस्त मानती थी, विरोध करने लगे वो मेरा। बोले कोरोना तुमने और तुम्हारी कौम ने फैलाया। जिनको मालूम था गलत है ये बात, उन्होंने भी न करा विरोध। फिर एहसास हुआ ढोंग था सिर्फ एकता का। 2 महीने लगे अवाम को पता लगने में की कोरोना कैसे फैलता है। मस्जिद के अलावा मंदिर, शराब के ठेकों व पार्टियों की भीड़ से भी फैलता है कोरोना। जहालत की कमी कभी न थी, न तब थी न आज है। 



तब से वाक़्यात देखने और सुनने में आए, कभी किसी बस्ती में आग लगी तो कहीं तलवारें उठीं। अनेकता में एकता फिर मर गई। कुछ लोग एक ज़माने से कहते आ रहे थे कि मुस्लिम कौम लड़कियों को पढ़ाती नहीं है। हालाँकि ये बात बिल्कुल गलत है। इस्लाम में तालीम व इल्म हासिल करने पर खूब ज़ोर दिया गया है। लोगों को गलत साबित करते हुए जब हमारी बच्चियां, लड़कियां व औरतों इस्लाम के दायरे में हिजाब पहन कर इल्म हासिल करने गईं तब भी लोगों को आपत्ति हुई। हिजाब पहनने पर पाबंदी की डिमांड रखी गई। न जाने इन लोगों ने संविधान पढ़ा या नहीं। लेकिन मैंने ये बखूबी पढ़ा था कि भारत के लोगों को स्वतंत्रता का अधिकार है। बोलने-चालने, खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने आदि की स्वतंत्रता। लोग हिजाब पहनने वाली छोटी बच्चियों के मुखालिफ हो गए, न जाने खुद को ढक कर कोई गुनाह कर दिया हो उसने। कोर्ट तक चले गए लोग उन पढ़ने वाली लड़कियों का हिजाब उतरवाने। हैरत हुई कि ऐसे लोगों के विरोध में मेरा अपना कोई न बोला। मैंने अपनी जर्नलिज्म की तालीम हिजाब में रह कर करी। तब मुझे सबने सराहा। हिजाब के खिलाफ जब नारे लगे तो कोई ना आगे आकर बोला। फिर एहसास हुआ मर गई है अनेकता में एकता।



इस महीने कुछ लोग बोले रमज़ान और नवरात्र एक साथ, वाह क्या बात! मुझे खुशी हुई कि अब लौट आई अनेकता में एकता। 2 दिन में हुई मैं गलत साबित। पता चला लोगों ने निकाला है राम नवमी मनाने का नया तरीका। मस्जिद के आगे ढोल बजा कर निकाला गया जलसा। एक जगह तो महंत बोले रेप करूँगा मुस्लिम औरतों का। चाहे इस्लाम हो या हिंदू धर्म, या ईसाई या सिख, हर धर्म में औरतों की इज़्ज़त है ज़रूरी। फिर क्यों ऐसे बोलने पर भी विरोध न किया बाकी धर्मों ने? 



वो कहते हैं जय श्री राम का नारा लगाओ तभी देश में जिंदा रह सकोगे, नहीं बोले जिसने ये तीन शब्द, जान गवाई है उसने। मैंने स्कूल में रामायण पढ़ी थी लेकिन आज तक याद नही आ रहा कि राम की शिक्षाओं में से एक क्या ये बात भी थी? 

हिन्दू धर्म का हर भगवान हिंसा के विरुद्ध है। फिर क्यों ये लोग धर्म के नाम पर हिंसा करने पर उतर आते है?  जो धर्म के नाम पर दूसरों को जीने नही दे रहे इनका हिसाब कौनसा भगवान करेगा? 


रमजान का महिना हमारे लिए पाक व सुकून का माना जाता है। मन व तन शांत रहता है। लेकिन इस साल तो जैसे कुछ लोगों ने ठेका ले लिया है इस महीने की एहमियत को नष्ट करने का। हर तरफ़ नफरत की आग फैली हुई है। हर राज्य में कहीं न नहीं मुसलमानों पर जुल्म या ज़्यादती हो रही है।

अफसोस तो इस बात का है कि कोई आवाज़ नही उठा रहा, कोई इसे रोकने का कदम नही उठा रहा। जिन्हें मैं अपना समझती हूँ उनमे से कोई आवाज़ नही उठा रहा। शायद मैं ही अनेकता में एकता के ढोंग में जी रही थी। मेरी बातें पढ़ने के बाद लोग बोलेंगे हम में तो नहीं है नफ़रत। अगर नहीं है नफ़रत तो आवाज़ उठाओ न! क्यों चुप हो ज़ुल्म ज़्यादती को देख कर? क्यों निष्पक्षता के चक्कर में इंसानियत से पीछे भाग रहे हो? 


 सब याद रख जाएगा। सब याद रखा जाएगा।

Comments

  1. Jb kanhaiya lal jese khi hindu ko muslmano ne mara tb kaha the yeh blog hindu kbhi hinsa mein pehl nhi krte jb tk lalkara na jeye tum log hme marte rho aur hum tumhari puja krte rhe waaahhhh

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  2. Agr sb dharm ki ladkiya izzat deserve krti hai jesa aapne likha hai toh hmari ldkiya jb fridge mein kti mili thi tb yeh awaz kaha thi kyu ni likha kuch tbh hypocrite

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  3. Jb tumhare log masjid se pathraw krte hai hmari yatra pr tb kuch nhi agr hum masjid ke aage sirf jai shree ram ke naare lgaye toh bohot dikat
    Madam itna hi problem hai toh kripya krke apne asli mulk Pakistan chle jaye

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