एक लड़की




मैं चुप हूँ तो कहते हैं बोलती क्यों नहीं,

आवाज़ उठाऊं तो ज़बान लंबी है मेरी।


ये न करो,

वो न करो,

इधर न जाओ ,

उधर मत जाओ,

लेकिन हमेशा अव्वल ही आकर दिखाओ।


उम्मीदों के दरवाज़े खोलोगे तभी तो आगे बढूंगी

पैरों में बेड़ियां डाल कर कब तक चलूंगी।


खुद से पहले  दूसरों की सोचो,

अपने अंदर के सारे ख्वाबों को आने से रोको।

लड़की हो कहकर न जाने कितने कामो से है मुझे रोका,

समाज मे हो रहे अत्याचार के डर से कितने ख्वाबों का गला है मैंने घोटा।


चुप हो जाऊँगी तो कहेंगे डर गई बेचारी,

बोलती चली जाऊँगी तो कैंची जैसी ज़ुबान है मेरी।


गलती मेरी नही कि मैं लड़की के रूप में पैदा हुई

गलती है उनके नज़रिये में जिनके लिए मैं कभी इससे बढ़कर ही न हुई।


कब तक खामोशी को मेरी ज़ुबान समझा जाएगा

रोज़ कोई न कोई बन्दिशों का ताला मुझपर लगया जाएगा 


इंतेज़ार है उस दिन का जब बेख़ौफ़ मैं बोल सकूँगी

अपने हौसले के बलबूते पर आगे बढ़ सकूँगी

जारी रहेगी मेरी कोशिश खुदको आज़ाद करने की

न रोक पाएंगी अब मुझे बंदिशें किसी की। 

- आतिफ़ा ऐमन










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